🌹🌹🌹जबी'न पर तेरे,जो लब थे मेरे,
जन्नत से थे, दिन ये मेरे।
शम्मी- फरोज़ा सी आँखों में तेरे,
होते थे सवेरे सारे ये मेरे।
बंधे हुए यूँ शफ़क़त में तेरे,
तस्कीन थी एक रूह में मेरे।
बहिश्त था एक बातों में तेरे,
क़ुर्ब जो था तू मेरे।
मुंतज़िर हैं हम आज भी तेरे,
तृष्णा बुझे जो पास हो तू मेरे।❤️💞🌹🌹
©deeprichu
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