शिकवे-ए-ग़म हमनें आपको हुजूर किया
बेशक हमनें बहुत बड़ा कुसूर किया,
आपकी तमन्ना की छांव में जिता रहा
और आप ही को मैं खुदगर्ज मजबूर किया।
सुर्ख पैरहन में सजी-संवरी जब जब देखा
रूखसार पे तेरे सब्ज शाख-ए-गुल से फित़ूर किया।
बा-खुदा हमनें कभी आलम-ए-बेखुदी न देखीं
मगर बार बार जाने क्यूं आपकी निगाहों का सुरुर किया।
मेरे जख्म-ए-दिल की ग़ज़ल हो या कोई शेर
शामिल आपकी यादों को जरुर किया।
आपके चाहने वालों की कतार में पाकर सबसे आगे
पता नहीं अपने दिल को कितना मगरूर किया।
आप हमारे साथ हमेशा रहे ये सोंच सोंच कर
सुकुत-ए-शब को भी अनुराग ने है मसरूर किया।
©anuragrahi
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