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शमशान लेकर मानेगा

नाजायज उधारी,ब्याज का धन,बगैर उसूल का व्यापार,
मानों या ना मानों पर ऐसा धंधा जरुर सारी दूकान लेकर मानेगा,
घंटों बैठा रहता है एक शख्स माँ बाप के कदमों के करीब,
माँ बाप लाख गरीब हो चाहे,पर वो सारा जहान लेकर मानेगा,
पल पल हर पल रहता है कोई रब की भक्ति में लीन,
दिखावा दिखता होगा जमाने को,पर वो भगवान लेकर मानेगा,
ढा रहा है अन्धाधुन्ध जुल्म कुदरत पर ये जालिम इंसान,
देख लेना सारी धरा को एक दिन ये वहशी इंसान लेकर मानेगा,
ना जाने क्यूं घमंड करता है आदमी मिटटी के खिलौने पर,
जानता है के हर एक को एक दिन, कब्रिस्तान या शमशान लेकर मानेगा
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©vikasgarg