आज खड़ा बाजार में ,
स्तब्ध हुआ !
देखकर एक जज़्बात ,
शोर थी होड़ मची थी ,
ले जाने और लाने को आज ,
एक लाश जा रही थी ,
पीछे थी शोर की बारात ,
कहते सुना मैं उनको ,
तेज चलों जल्दी पहुंचो शमशान ,
शोर थी होड़ मची थी ,
ले जाने और लाने को आज ,
पास ही एक दुकान थी ,
जहां बिक रही थी लाश ,
हाथों में पैसा और थैला ले ,
कुछ लोग चीख रहे थे ,
ऐ भाई जल्दी तौलों ,
घर पहुंचने में देर हो जायेगी आज ,
शोर थी होड़ मची थी ,
ले जाने और लाने को आज ,
आंख मेरी नम हुई ,
देख कर ऐ जज़्बात ,
दिया प्रभु को धन्यवाद ,
वाह तेरी कैसी लीला ,
हे परवरदिगार !
होकर मायूस मैं घर को लौटा ,
अर्पित सुमन संवेदना को आज ,
शोर थी होड़ मची थी ,
ले जाने और लाने को आज ।🤔
धन्यवाद 🙏
_____संजय निराला ✍
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