सहर-ओ-शाम आती इक ख्यालात ने रोने न दिया
दिल में बसी अब तक तेरी याद ने रोने न दिया।
हर ज़ख्म सह लू मगर दूर नहीं रह सकता तुझसे तन्हा
इस दिवार पर तेरी टंगी तस्वीर ने रोने न दिया।
बंद कमरे को अब तक नशेमन है बनाया मैंने
वस्ल की उम्मीद की रोशनी ने मुझे रोने न दिया।
हालात-ए-जज्बात को आखिर ब्यां करूं किससे
इश्क़ में गैरत-ए-जज्बात ने मुझे रोने न दिया।
तुम जो कहती थी रोने से न बदलती है नसीब
तेरे इस बात ने ही उम्र भर मुझे रोने न दिया।
घड़ी दो घड़ी की कहर-ए-सदमात पर रोते अनुराग
हर रोज़ हर पल नए नए सदमें ने मुझे रोने न दिया।
©anuragrahi
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