V

श्राद्ध

श्राद्ध के पावन दिन आ गये,
हमारे पितृ हमारे घर आ गये,
इक आदमी अपने पिता का श्राद्ध करना चाहता था,
पता नहीं कब से घर के अंदर बाहर घूम रहा था,
शायद उसके दिमाग के अंदर कुछ घूम रहा था,
या शायद वो इधर उधर कुछ ढूंढ रहा था,
इतने में लड़के का चाचा आया और आकर बोला,
आज की तिथि के दिन तुम्हारे पिता जी का श्राद्ध है,
तुम इधर उधर चक्कर क्यों लगा रहे हो,
लगता है तुम्हारी तबीयत खराब है,
लड़का बोला, लगता है कि मैं आज श्राद्ध
अच्छी तरह से नहीं कर सकूंगा,
पंडित जी को खाना खिलाते समय मैं
बिल्ली के ऊपर टोकरी ना रख सकूंगा,
चाचा जी बोले, तुमको ये बिल्ली और
टोकरी के बारे में क्यों सोचा,
मुझको भी तो बताओ कि इस बात के
पीछे क्या है सारा लोचा,
लड़का बोला, बचपन की ये बात है,
मुझको आज भी अच्छे से याद है,
पिता जी जब दादा जी का श्राद्ध करते थे,
तब पिता जी ऐसा करते थे,
चाचा जी हंसते हुए बोले,
हंसते हुए बिल्ली और टोकरी का राज खोले,
हमारे पड़ोसी ने एक बिल्ली थी पाली,
नाम जिसका रखा था लाली,
श्राद्ध तिथि के दिन घर में बनाई जाती थी खीर,
खीर की सुगंध से लाली टपकाती थी जुबान से नीर,
तुम्हारे पिता जी ने एक रास्ता निकाल लिया,
लाली बिल्ली के ऊपर टोकरी को डाल दिया,
अब तुम छोड़ दो बिल्ली, टोकरी का अंधविश्वास,
आओ पुरा करते हैं तुम्हारे पिता जी का श्राद्ध।
श्राद्ध अंधविश्वास से नहीं,
श्रद्धा से किया जाता है
विकास गर्ग
©vicky