भारत देश नाम भयहारी,
जन-जन इसको गाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
विचरण होगा हिमाच्छन्न शीतल प्रदेश में,
पोत संतरण विस्तृत सागर की छाती पर,
होगा नव-निर्माण सब कहीं देवालय का,
पावनतम भारतभू की उदार माटी पर,
यह भारत है देश हमारा कहकर आनंद मनाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
हम सेतुबंध ऊँचा कर मार्ग बनाएँये,
पुल द्वारा सिंहल द्वीप हिंद से जोड़ेंगे,
जो वंग देश से होकर सागर में गिरते,
उन जल-मार्गों का मुख पश्चिम को मोड़ेंगे,
उस जल से ही मध्य देश में अधिक अन्न उपजाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
खोल लिया जाएगा, सोने की खानों को,
खोद लिया जाएगा, स्वर्ण हमारा होगा,
आठ दिशाओं में, दुनियाँ के हर कोने में,
सोने का अतुलित निर्यात हमारा होगा,
स्वर्ण बेचकर अपने घर में नाना वस्तु मंगाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
डुबकी लगा करेगी नित दक्षिण सागर में,
लेंगी मुक्ताराशि निकाल हमारी बाँहें,
मचलेंगे दुनियाँ के व्यापारी,
पश्चिम के तट पर खड़े देखते सदा हमारी राहें,
कृपाकांक्षी बनकर वे हर वस्तु वाँछित लाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
सिंधु नदी की इठलाती उर्मिल धारा पर,
उस प्रदेश की मधुर चाँदनी युक्त रातों में,
केरलवासिनि अनुपमेय सुदरियों के संग,
हम विचरेंगे बल खाती चलती नावों में,
कर्णमधुर होते हैं तेलुगु गीत उन्हें हम गाएँगे,
सब शत्रुभाव मिट जाएँये,
खूब उपजता गेहूँ गंगा के कछार में,
तांबूल अच्छे हैं कावेरी के तट के,
तांबूल दे विनिमय कर लेंगे गेहूँ का,
सिंह समान मरहठों की ओजस् कविता के पुरस्कार में,
उनको हम केरल-गजदंत लुटाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे,
🌹🌹🌹
©vicky
V