शून्य के स्वर
मंद-मंद महक रही,
ये गंध किस फूल की?
संग-संग चल रही,
ये द्वंद शील मन की?
है दस दिशा, हर ओर तुम
मेरी शून्यता का आधार तुम
इन करो कि रेखाओं से,
इस भाग्य की पहचान तुम
वो तरंग कहा से बह रही,
जो आत्मा झंझोर दे,
मेरे श्वास के अंतरों को,
अंदर ही रोक दे,
कर्ण व्याकुल तरस गए,
जो ध्वनि हृदय राम की,
दृश्य दिखे अंधकार में,
बने छवि सोम की,
इन गरल रचे अधर से,
सुधा पान की है चेष्टा,
नगण्य इस शरीर की,
है आत्मा विशेषता।
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