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सिलसिला खताओं के हमसे थमता कब है।

सिलसिले खताओं के हमसे थमता कब है
दिमाग तो इफ़्तार पर मगरीब का नामाज करता कब है।
पर्व-त्योहार आता है और फिर गुज़र जाता है हर साल
मगर डुब जाता है जो लम्हात फिर उभरता कब है।
ऐसा लगता है कि उसकी याद आती है बहुत लेकिन
याद आने से ये ज़ख्म-ए-दिल भरता कब है
लहर के सामने साहिल की हकीकत क्या है
जिनको जिना है हालात से डरता कब है।
हमने जिन जिन को चाहा दूरियां बढ़ती गई उससे
वफ़ा के बदले जफा के सिवा कुछ मिलता कब है।
ये अलग बात है तेरे लहजे में उदासी है अनुराग
वगरना कभी तुम दर्द का इजहार करता कब है।
©anuragrahi