सजाई जाएंगी दरीचे पर मोमबत्तियां कब तक
तुफां तो आनी है मनेगी ये दिवाली कब तक।
चारो तरफ़ है खौफ कोई जगह महफूज़ नहीं
अब बंद रहेगी घरों की दरवाजे किंवाड़ीयां कब तक।
सलाखें ऐसी नहीं बनी कड़ोड़ो को जो कैद करे
देख लो रखता है कैद कोरोना जिन्दगानियां कब तक।
जनाब कहते हैं वजीर ए आजम कुछ तो गौर करो
उठाएंगे वे अकेले सबकी जिम्मेदारीयां कब तक।
है हमारे बहने भाई डाक्टर नर्स सेवा में तत्पर
अनुराग ये समझेंगे जाहिल मौलवीयां कब तक।
©anuragrahi
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