एहसास हुआ उस रात को,तुझमें कितनी नशा है!
फासले नजदीक थे इन लबों के बीच में,
धड़कनें बढ़ रही थी,रात की तन्हाई से,
डूब रहा था मैं,तेरे हुस्न ओ शबाब में,
बरस रही थी उज्जवल चांदनी,उन बेदाग बदन पर,
थी शरारत तुझमें भी,जो दिख रही थी तेरी आंखोँ में,
तू थी एक शोख हसीना,था मन मेरा प्यासा,
घूल रही थी तेरी खूशबू,उन महकी फिज़ाओं में,
बेशर्म थे वो हवा के झोंके,जो सरक गया दुपट्टा तेरा,
उलझे हुए थे तेरे इरादे,तू लिपट गयी मेरी बाहों में,
था वो वक़्त मुकर्रर,पर रात भी दिवानी थी,
इश्क़ के वो फसाने,जो समा गयी तेरी तस्वीर में,
इस जुम्बिश को देख कर ,चाँद भी शर्मा गया,
हो गये थे दो जिस्म एक,जो सावन की उस रात में।।
©bhaskara
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