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" समानता "

बंधनों में बंधित कैसा इंसान है
जो खुद को जानने से ही अनजान है
भीतर से ना जिसकी कोई पहचान है
बाहरी दिखावटी में ही बसती उसकी जान है
इंसानियत ही हर जाति का ईमान है
जहां करता यह ढोंग उच्च श्रेणी से ही सम्मान है
लिबास में लिपटे इस तन में कब तक यह प्राण है
तो निगाहों में क्यों यह अभिमान है
जब शरीर की रचना ही एक समान है
जब शरीर की रचना ही एक समान है
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