समेट रही हूं मैं सब कुछ
देखो न कुछ छूटा तो नहीं है ।
1)
वो शहर छूटा,
जहां हम चहके और खेलें
वो गलियां भी छूट तो गयी ।
कुछ अज़ीज़ , कुछ दिल के करीब ,
और जाने क्या क्या छूट गया ।।
समेट रही हूं मैं सब कुछ
देखो न कुछ छूटा तो नहीं है ।
2)
वो चकरी में लिपटा मांझा छूटा,
जहां कटी पतंगें लूटकर भागे
वो छत भी पीछे छूट गया ।
कुछ नटखट सा, कुछ प्यारा सा,
हाय भोला बचपन छूट गया ।।
समेट रही हूं मै सब कुछ
देखो न कुछ छूटा तो नहीं है ।
3)
वो आम का बगीचा छूटा,
जहां डाल झूला झूलते हम कभी
वो डाली भी तो छूट गयी ।
कुछ कच्चे से , कुछ पक्के से ,
बचपन के साथी छूट गए ।।
समेट रही हूं मैं सब कुछ
देखो न कुछ छूटा तो नहीं है ।
4)
वो दादा जी का कांधा छूटा,
जहां थपकी दे कर सुलाती थी दादी
वो खटिया भी तो छूट गई ।
वो सुरीली सी लोरी , वो जादुई सी कहानी
ये सारे पीछे छूट गए ।।
समेट रही हूं मैं सब कुछ
देखो न कुछ छूटा तो नहीं है ।
5)
वो पापा की उंगली छूटी,
जहां प्यार से खाना खिलाती मां
वो आंगन भी तो छूट गया ।
कभी हंसता तो कभी हंसाता ,
मेरा प्यारा भाई छूट गया ।।
समेट तो रहीं हूं मैं सब कुछ
देखो न लेकिन सब कुछ ही तो छूट रहा है ।
-- शिवांगी गौतम ।।
©shiwangi
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