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समझे वो मेरी ग़ज़ल जो हो दिवाना किसी का ।

समझे वो मेरी ग़ज़ल जो हो दिवाना किसी का
लफ्ज़ तो मेरी अपनी है अफसाना किसी का।
आंखों से सोते निंद भी जिन्हें देखा करते हैं
निंद नई है अंदाज वहीं पुराना किसी का।
क्या खुबसूरत है जो चांद सी तेरी सुरत
खुदा के वास्ते रौशन करो आशियाना किसी का।
आंशु आ जाए आंखों में निंद के बदले साहब
किसी रात ऐसे जाकर सुनो अफसाना किसी का।
प्यार नहीं आती है तेरे दिल में तो नहीं आए
चाहत से ही है आबाद ठिकाना किसी का।
कोई नहीं है साथी क्यों इस आखिरी दम तक
काम आया नहीं अब तक दोस्तान किसी का।
तमाम उम्र इस हसरत को कभी मिटने नहीं देंगे
आए न जब तलक आंशु या पछताना किसी का।
करने नहीं देते ब्यां हालात अनुराग के दिल को
सुनाओगे बड़ी गौर से कभी अफसाना किसी का।
©anuragrahi