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"संघर्ष"

पक्षी रोज निकलता है और हर बार अपने घर की स्थिति में परिवर्तन पाता है कभी हवाओं की मार से कभी बारिश की बौछार से पर फिर भी वह पूर्ण सक्रियता से उसे पहले जैसा बनाए जा रहा है........
मानव फिर तू क्यों समान दिन की आस किए जा रहा है......
जहां हर दिन समस्याओं का निदान तेरी आस किए जा रहा है.........
जो खुद को पूरी के दरवाजों में बंद कर भीतरी मजबूती को सीमित किए जा रहा है.....
बीते दिनों को सँवारे जा रहा है पर प्रत्यक्ष को क्यों निहारे जा रहा है.........
बढ़ा अपने कदमों को संघर्षों के बीच में क्योंकि सारा संसार तेरे सार का इंतजार किए जा रहा है......
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