सनम
तेरे नज़रअंदाज़ करने का भी,
ये कैसा अंदाज़ है सनम!
मोहब्बत से वाक़िफ़ तो है तू मेरी,
मगर फिर भी क्यूँ अनजान है सनम!
लबों से कुछ कह नहीं सकता,
शायद कोई मजबूरी रही होगी,
मगर मेरी आँखों से तो मेरे दिल का,
हर एक राज बयान है सनम।
हर रोज़ सामने होकर भी,
तू मुझसे कितनी दूर है,
दिलों के इन फ़ासलों का भी,
ये कितना अजीब इम्तिहान है सनम।
अगर अनजान रहना ही तेरी मर्ज़ी है,
तो फ़िर तू बेझिझक यूँ ही रह,
मगर सुन ये इश्क़ है और इसमें,
तेरा भी नुकसान है सनम।
© विशाल सैनी