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सोच मेरे समाज की

देकर मेरे अरमानों की बलि ...ऐ मेरे समाज के
लोगों .... ये कैसी दुरगती फैलाई है
इतना सबकुछ करने के बाद ये ..,कहकर
निकल जाते हो की ..,,,अरे ये तो अनपढ़ ,,,
.....ही आई है ...,!

©poojapal