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सोंचता हूं तो,सोंचता हूं कि कुछ कमी सी है।

सोचता हूं तो,सोचता हूं कि कुछ कमी सी है
हर वक्त खिसक रही मेरे पैरों तले जमीं सी है।
आज़ फिर आप वादा कर के नहीं आई
महफ़िल में बहुत खल रही आपकी कमी सी है।
किस किस को जबाव देंगी किस किस के तरफ़ देखेंगी
यहां के हर आंखों में बस नमी सी है।
आपसे रहता होगा वक्त थमकर मगर हमसे नहीं
जाने क्यूं इसकी भी आदत आदमी सी है।
मैं फकत चला रहा हूं अपनी सांसें आपके लिए
हवा के बिन तो बहुत देर से ये नब्ज़ थमी सी है।
जानता हूं अनुराग से कभी दिल का रिश्ता नहीं रहा
फिर भी एक तस्लीम तुम्हारी लाज़मी सी है।
©anuragrahi