सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ,
व्यथित वेदना पल रही ,
कुछ वो भी धुन रही ,
उसको भी कुछ गढ़ लेने दो ,
सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ,
अगर जागा भी तो ,
मैं क्या कर लूंगा ,
मर चुकी संवेदना को ,
कैसे जीवित करूंगा ,
बुझे दीपक को ,
कैसे प्रज्वलित करुंगा ,
सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ,
मत दिखा हसीन सपने ,
फैला कर कल्पनाओं का शब्दबाण ,
मैंने देखें है अपनों के ,
बहुत ही मायाजाल ,
पल-पल बदलते ,
गिरगिट जैसे रंग हजार ,
अब छल ना मुझे ,
मैं जा चुका अपने धाम ,
सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ,
बाहर भी तो सब कब्र में ही ,
चलते फिरते मुर्दे समान ,
महत्त्वकांक्षाओं के बोझ तले ,
दबे कुचले व्यथित इंसान ,
सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ,
बड़ी चैन सुकून यहां ,
ना कोई महत्त्वकांक्षाओं का बाजार ,
ना कोई उमस ,
ना कोई जलन ,
ना कोई भेद भाव विचार ,
मिट्टी का ठंडक भरा ,
स्नेह मिलता अपरम्पार ,
सोने दो मुझे ना जगा ,
सूरज उगे सूरज डूबे ,
मुझे ना बतला ।🤔
धन्यवाद 🙏
_____संजय निराला ✍
N