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" सफर "

ख्वाबों की मंजर का सफर जारी रखता हूं..
हर जर्रे की सुंदरता को आंखों में भरता हूँ..
राहो की जटिलता को बाहों में भरता हूं..
भीतर के किनारे पर हर रोज टहलता हूं..
कभी दुनिया के जाल में भी फंसता हूँ..
पर फिर निकल कर खुद से संवरता हूं..
व्यक्तित्व की गहराइयों से बातें करता हूं ..
बातों केे उन लम्हों को सांसो में भरता हूं..
जब भी कुछ गलती करता हूं ..
तो ईश्वर के समक्ष खुद को हाजिर करता हूं ..
फिर ना करने के लिए खुद को काबिल करता हूं ..
सफर जारी रखता हूं ....
सफर जारी रखता हूं......
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