S

सपनें

हाँ माना पहिये रूकें हैं
ट्रेन रुकी है गाड़ियाँ भी
आना जाना भी बंद है
अपने घर में हम भी बंद हैं
पर क्या हवाएं रुकीं हैं?
क्या सुबह सूरज नहीं निकलता?
क्या रात नहीं होती?
होती है न ?
तो हमारे सपनों को जीना
हम कैसे छोड़ दें ?
बाहर नहीं निकल सकते
घर पर रहकर अपने सपनों को तो जी सकते है
उसे निख़ार भी सकते है
हवाओं में थोड़ी सी निराशा है तो क्या हुआ ?
हम अपनी आशा की ज्योत की
थोड़ी रौशनी उसे भी दे देंगें
ख़ुद को भी जीना सिखाएँगे
और दूसरों के लिए प्रेरणा भी बनेंगें
ना अपने सपनें टूटने देंगें ना तुम्हारे
क्योंकि इस बार हमने मोहब्बत
इंसानियत से की है
खुदगर्ज़ी से नहीं l
©sonamsinha