सत्य प्रेम
प्रेम के पहलुओं को समझता हृदय
प्रकृति के हर जर्रे से मिलता है हृदय
ईश्वर के इस प्रेममया में डूबता हृदय
ईश्वर में ही सत्य प्रेम को देख पाया है
ईश्वर ने इस जहां में बड़ी खूबसूरती से प्रेम को सजाया है
पर मनुष्य ने अपनी स्वतंत्रता से स्वार्थ का परचम लहराया है प्रेम की सुंदर कश्तियों को भूल,
मनुष्य ने खुद को दरिया में डुबाया है
अपेक्षाओं की माटी से मनुष्य दलदल में फंस आया है
इस छलावे के प्रेम ने उसे दुःख ही दिखाया है
क्योंकि वर्तमानी मनुष्य स्वार्थता में कुटिल हो आया है इसीलिए डूब ए मानव ईश्वर प्रेम में,
क्योंकि उसी में निश्चलता का शीतल रूप समाया है
उसी में आनंद वन छाया है
और निर्मल प्रेम की पूर्णता का आभामंडल समाय है।।
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