सुना है उनके शहर में कमीं रहबर का न था
अकेला बढता जा रहा था मैं हमसफ़र न था।
हमको तलाश थी साया-ए-मरहला की कोई
अपना तो था कोई मगर पता उसके घर का न था।
हम ढुंढ रहे थे उन्हें करीब उन्हीं के जाकर
मसरूफ निगाहों के उनके मेरा ख़बर न था।
लिख दिया था तख्त पर किसी ने हालात-ए-शहर
लौट जाओ आने वालों यहां कोई बसर न था।
शहर उजड़ रहे और मैं गुनगुनाता जा रहा था ग़ज़ल
ख़ुद को तन्हा पा रहा आता कोई नज़र न था।
उम्मीदें उससे वस्ल की हर घड़ी थी हों रही नाकाम
अनुराग दम घुंट भी लेता मगर पास मेरे ज़हर न था।
©anuragrahi
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