सुनो...
तुम मेरी बारिश की आख़िरी बूंद हो,
वो बूंद जो गिरते-गिरते भी
ज़मीन को मोहब्बत का एहसास दे जाती है।
तुम मेरी आँख से निकली नदी का आख़िरी क़तरा हो,
जो सूखने से पहले
दिल की सारी कहानी कह जाना चाहता है।
तुम… मेरी आख़िरी मोहब्बत हो।
तुमसे पहले जो भी था,
वो शायद चाहत थी, आदत थी, या बस एक ख़्वाब,
पर तुम —
तुम वो सच हो
जिसे खोने का ख़याल भी मेरी साँसों को भारी कर देता है।
जब रात बहुत गहरी हो जाती है,
और चाँद भी थक कर बादलों में छिप जाता है,
तब तुम्हारी याद
मेरे सीने में धीमी आग बनकर जलती रहती है।
मैं आँखें बंद करती हूँ,
तो तुम्हारा चेहरा उजाले की तरह फैल जाता है,
जैसे अँधेरे को जीने की वजह मिल गई हो।
तुम्हें चाहना अब मेरा इख़्तियार नहीं रहा,
ये मेरी आदत से आगे,
मेरी ज़रूरत से भी आगे,
मेरी रूह की धड़कन बन चुका है।
कभी-कभी सोचती हूँ,
अगर तुम पास होते…
तो शायद ये बेचैनी मुस्कान बन जाती,
ये अधूरी साँसें मुकम्मल हो जातीं,
और मेरी हर सुबह
तुम्हारे नाम से शुरू होती।
तुम्हारी हँसी —
जैसे सूखे मौसम पर पहली बारिश,
तुम्हारी आवाज़ —
जैसे दूर कहीं बजती कोई अधूरी धुन,
जिसे सुनकर दिल बार-बार उसी तरफ़ लौटना चाहता है।
मैं तुम्हें सिर्फ़ चाहती नहीं,
मैं तुम्हें महसूस करती हूँ —
हवा की तरह,
धड़कन की तरह,
उस दुआ की तरह
जो हर रात ख़ुद-ब-ख़ुद मेरे होंठों पर आ जाती है।
अगर मोहब्बत का कोई आख़िरी पड़ाव होता है,
तो मैं वहीं खड़ी हूँ —
तुम्हारा इंतज़ार करती हुई,
हाथों में अपनी सारी उम्र लेकर।
और सुनो…
अगर कभी दुनिया हमसे दूर हो जाए,
वक़्त हमें अलग रास्तों पर ले जाए,
तो भी यक़ीन रखना —
मेरी हर कहानी का आख़िरी लफ़्ज़
सिर्फ़ तुम रहोगे।
क्योंकि तुम मेरी बारिश की आख़िरी बूंद हो…
मेरी आँख की आख़िरी नमी,
मेरी दुआ का आख़िरी नाम,
और मेरी मोहब्बत का
सबसे सच्चा अंजाम हो।
-शिवन्या
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