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सुनो जाना....

सुनो जाना....
सुनो जाना…
मैं पहले ऐसी न थी
जैसी अब हो गई हूँ।
मैं पहले इतना हँसती न थी,
जितना अब हँस रही हूँ।
बदल रही हूँ,
संवर रही हूँ,
निखर रही हूँ।

पहले मैं खुद से मिलती न थी,
कई बातें मेरी अपनी न थीं,
मुस्कान भी यूँ खिलती न थी।
अब खिल रही हूँ,
बदल रही हूँ,
संवर रही हूँ,
निखर रही हूँ।

शब्द मेरे इतने मुखर न थे,
मेरे सपनों को भी पर न थे,
होकर भी जैसे मेरे घर न थे।
अब घर बना रही हूँ,
बदल रही हूँ,
संवर रही हूँ,
निखर रही हूँ।

दिल की ऐसी हालत न थी,
किसी से ऐसी मोहब्बत न थी,
किसी के लिए यूँ पागल न थी।
अब पगला रही हूँ,
बदल रही हूँ,
संवर रही हूँ,
निखर रही हूँ।

सुनो जाना…
शायद तुम्हारे होने से ही
मैं रोज जरा ज्यादा जी रही हूँ।
जो न करना था,वो भी कर रही हूँ,
सपने देख रही हूँ।
देखो न जाना,
मैं तेरे इश्क़ में
बदल रही हूँ,
संवर रही हूँ,
निखर रही हूँ।

-शिवन्या

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