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सुनो ना...

सुनो ना...

सुनो ना…

क्या तुम भी मुझे उतना ही सोचते हो, जितना मैं सोचती हूँ?

क्या तुम भी मुझे उतना ही याद करते हो, जितना मैं करती हूँ?

सुनो ना

क्या तुम्हारी भी हर धड़कन मेरा ही नाम लेती है,

क्या तुम्हें भी हर जगह मैं ही नज़र आती हूँ?

सुनो ना…

क्या बारिश की पहली बूँद तुम्हें मेरे ना होने का एहसास कराती है?

क्या दिन का आख़िरी पहर तुम्हें भी बेकरार कर जाता है?

सुनो ना, क्या तुम्हारी भी हर राह मुझ तक जाती है,

क्या तुम्हें भी हर मंज़िल मेरे बिना अधूरी लगती है?

सुनो ना…

क्या ले पाते हो तुम भी कोई साँस मेरे बिना?

क्या रह पाते हो एक पल भी मेरा नाम लिए बिना?

सुनो ना…

क्या ज़िंदगी मेरे बिना भी ज़िंदगी लगती है?

क्या मेरे बिना हर खुशी अधूरी सी लगती है?

सुनो ना…

क्या तुम भी जागते हो मेरी यादों की खुशबू के साथ?

क्या तुम भी सोते हो बाँहों में तकिये के साथ ?

सुनो ना...

क्या तुम्हें भी मेरे बिना सब कुछ अधूरा लगता है,

क्या मेरे साथ सब कुछ पूरा लगता है?

सुनो ना…

क्या तुम्हे भी हर सावन रहता है मेरा इंतज़ार?

क्या हर सर्द रात को खलती हैं मेरी गर्म बाँहों का हार?

सुनो ना…

क्या तुम भी उतना ही करते हो प्यार, जितना मैं करती हूँ?

क्या तुम भी उतना ही तड़पते हो, जितना मैं तरसती हूँ?

सुनो ना…

क्या तुम भी उतना ही सोचते हो, जितना मैं सोचती हूँ तुम्हें?

क्या तुम भी उतना ही चाहते हो, जितना मैं चाहती हूँ तुम्हें…?

✍️शिवन्या