राहो पर सुनसान निकल जाता हूं
भीतर के बचपन में थोड़ा खेल आता हूं ,
और मुस्कुराहट को चेहरे पर ले आता हूं
मन के हरे घावो से हरा रंग पेड़ों के पत्तो को दे आता हूं
पानी से थोड़ी निर्मलता ले आता हूं और हृदय को उस में डूबा लाता हूं..
पत्थरों से मित्रता कर उनसे टकरा जाता हूं और मन को कठोरता के धागों में बंधा लाता हूं..
हवाओं के संग बहता जाता हूं और आंखों की नमी को सुखा लाता हूं...
ईश्वर की निकटता को मन रुपी मकान की ईटो में चुना लाता हूं...
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