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सुरमे की तरह आंखों में कोई शाम सज़ा लो मुझको।

सुरमे की तरह आंखों में कोई शाम सज़ा लो मुझको
मैं तुझ से कभी रूठ जाऊं गर तो मना लो मुझको।
आब-ए-गम दिन-ब-दिन बढ़ते हैं जा रहें मेरे
मैं डुब न जाऊं अब इस समंदर से निकालो मुझको।
मैं अगर कोई गुल नहीं हूं तो कोई अंगार भी नहीं
बेख़ौफ़ होकर अपने दामन से लगा लो मुझको।
तुझपे ऐतवार करके ही मेरे दिल ने लिया है फैसला
हमने बना लिया तुझे अपना तुम भी बना लो मुझको।
सभी को छोड़कर अब तुम्हीं तो मेरा सहारा हो
छोड़ कर न जाओ यादों के उजालों मुझको।
हम दर्द की शिकायतें एक दूसरे से करते रहे फिजूल
दर्द ने कहा अनुराग! संगीत में ढालो मुझको।
©anuragrahi