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सुरत दिखाई बार बार मगर हमसे भटक गई।

सुरत दिखाई बार बार,मगर हमसे भटक गई
अब तक तो थी आसपास यही पर,जाने किधर गई।
मेरे नजर में कोई तो, परेशानी ज़रूर था
देखा उन्हें दिमाग से मगर फिर उतर गई।

हुई जो खता कोई हमसे,खम था पुरा बदन
रगबत भी इस दिललगी का,फिर नकाम कर गई।
फुरकत की बनी राहों का कहीं पर निसार हो
दिल में दबी जज्बात फिर,यही सवाल कर गई।
दामन से लगाकर रखू अपने अहल-ए-जिगर को
गर्द-ए-फिराक से सनी लब्बों पर,ये अल्फाज बन गई।
मेरे रफिक तू ढुंढ के ला करिब अब मेरे हबीब को
खलवत से परेशां जिस्म से, ये जां निकल गई।
©anuragrahi