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" सूक्ष्मता "

मन केे राही
गहराई में जाना...
विचारों को अपने शुद्ध बनाना ....
घायल भीतर के मरहम लगाना....
राग द्वेष से मुक्ति पाना....
स्वयं के स्वरूप में लिप्त हो जाना....
कर्म निष्ठा में भीग जाना.....
भीतर की रोशनी से रंगीन हो जाना....
जग की पतवार में भटक ना जाना....
किनारे की ओर ही बढ़ते जाना.....
समय है खुद को जान जाना .....
जीवन की सुक्ष्मता को पहचान जाना....
खुद को ईश्वर के समक्ष पाना ....
शुद्ध कर्मों के उनको फूल चढ़ाना....
और उन्हीं के चरणों में समर्पित हो जाना....
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