मौसम के बयानों में ,
अनुभव के ठिकानों में ,
ठिठुरन की बाहों में ,
हवाओं के चरणों में ,
धुंधली चादर के सिरहानो में ,
स्थिर क्रियाकलापों में ,
तू भीतर से विश्राम कर..
इस गर्दिश के मयखानों में ,
तू स्वयं में सुधार कर ..
मौसम के बदलावों में ,
तू खुद में भी बदलाव कर..
हृदय के दरमियानो में ,
तू सूरज की चाह कर ....
तू सूरज की चाह कर......
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