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स्वार्थी जन

स्वार्थी जन
स्वार्थ परख है हर जन
जिसमें समाया है खोखला मन
लालसा में डूबा है जिसका तन
भावो का ना होता जिसमें आगमन
दोहरे दृश्य दिखाता है जिसका कांटों से भरा बुद्धि रूपी वन शुद्ध मनुष्यता को नष्ट करता है यह जन
संभल जा रे ओ मेरे मन
तू ना बनना कभी ऐसा जन
और निस्वार्थता में आहूत कर देना ,
अपना यह क्षणभंगुर तन ।।