करूणा फल मेवा बने घृणा विष समान।
पढ़ लिखकर काहे करे कागज कलम अपमान।।
प्रेम बिना कोई नहीं प्रेम प्यासा मुरत तक होय।
मुख अगर कछू न कहै तो नैन काहे न रोय ।।
सुख दुख सब बिसारी के धरो ध्यान का रूप।
ये जिवन का प्रसाद है कठिन मानव स्वरूप।।
जग मांगत हैं मोटरी मन मानत है बोझ।
का करी हम मोटरी रवि मुफ्त में ओज।।
अपने घर मोहे बुलाई के ना कर कर्जदार।
मोरा ठोर काहूं नहीं तोर करू काहूं सत्कार।।
सोना अब चांदी बना चांदी बना अब बंग।
रोटी दाल चावल वहीं खाने का क्या क्या ढंग।।
©anuragrahi
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