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स्वर्गवासी मेरी पत्नी विभा को समर्पित।

गोरा बदन निश्छल मन स्वाभिमानी मेरी रानी थी
दिल में किसी से बैर नहीं वो तो प्रेम दिवानी थी।
हमने तुझको समझ न पाया न तेरा सत्कार किया
गरूर में अपने अब खो दिया जो मेरी असल जवानी थी।
ये जग सिर्फ एक माया है कब कैसे किसका कोई साया है
समझ में आता नहीं कह दिया अब तक जो रूहानी थी।
क्या खुशी कभी चेहरे पर क्या होगा गम दिल में अब
दोनों अकेली ले उड़ चली जो संग संग मेरे निबाहनी थी।
कैसे सात फेरों का विश्वास करे ईश्वर तेरा सम्मान करे
संग जिने संग मरने की बस ये रची झुठी तेरी कहानी थी।
तेरे नजर में तो अपना कोई नहीं तू किसी का अपना नहीं
मगर तूने वो छिन लिया आज जो मेरी जिंदगानी थी।
©anuragrahi