बिखरे इस जहां में कश्तियां कई हजार है
भीतर में उनके कई मनमर्जियां सवार है
चलाने की खुद को कई पतवार है
घूमती है वो जहां में जहाँ होता परिस्थितियों का वार है
कभी मधुर हवाओं को चीरती,
कभी होता आंधियों का वार है
इन्हीं में होती कभी सूखता की बहार है
कभी आता उनके सामने दुःखता का वार है
घूम घूम कर जब थक जाती तो आता शांति का विचार है रात्रि की पूर्णता ही उसके चिंतन का आधार है
भोर संग सूरज लाता एक चमकता द्वार है
जो किनारे पर पहुंचने का सुलभ एक सार है
कश्ती जो थामती सूर्य का साथ है
फिर धीरे धीरे होती वो इस जहां से किनार है
और भरता उसके हृदय में आभार ही आभार है
यही तो उस स्वतंत्रता की राह है
जिसकी भीतर में उसके उठती गहन एक गुहार है
इसी से प्रस्फुटित होती वास्तविक स्वतंत्रता की बहार है वास्तविक स्वतंत्रता की बहार है !!
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