तड़प किसे कहते है जानते हो
जब सब आस पास हो
और तुम्हारा अपना कोई न हो
जब सब तुम्हे अपना कहे
पर कोई साथ न दे
जब एक काफिले के साथ चलते हुए
एहसास हो अकेलेपन का
जी भर के किसी के कंधे पर सिर रखकर
रोना चाहो
और रो भी न पाओ
एक हर्फ अटका हो जैसे
तुम्हारी ज़ुबान पर
और किसी से कुछ कह भी न पाओ
तड़प कहते है उसे
जब तुम चाहो सबको
पर तुम किसी की चाहत न बन पाओ
लाख मशवरे हो तुम्हारे पास
मगर कोई सलाहकार
तुम्हे खुश न देख पाए
अपनी दीवानगी का तुम्हें
बस यही इनाम मिल पाए
तड़पो तुम और सारा जग
तुम पर मुस्कराए
अपनी आंखों की नमी को
हर शक्स से छुपाए
तड़प कहते है
जब दिल चीख कर रोना चाहे
और कोई चुप कराने भी न आए।।
©shaaya
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