तेरे बगैर
कहाँ बिखेर रहा है तू अपनी रौशनी मेरे बगैर,
जीने का अब कोई सबब ही नहीं है तेरे बगैर…
हर एक ख़्वाब टूट के बिखरा है ख़ाक में,
कुछ भी नहीं बचा तेरी मौजूदगी के बगैर…
दिल किस तरह संभाले ये वीरान ज़िंदगी,
हर धड़कन चल रही है तेरी धुन के बगैर…
कभी तो सोच मेरी हालत-ए-दिल पे ऐ सनम,
मैं कुछ नहीं रही हूँ तेरी चाह के बगैर…
आँखों में बस गया है तेरा ग़म इस क़दर,
कुछ भी नज़र न आए तेरे अक्स के बगैर…
तेरी हीर आज भी है मुन्तज़िर उसी जगह,
जैसे कोई दरिया हो साहिल के बगैर…
अब लौट आ के वक़्त भी ठहरा हुआ सा है,
वरना ये इश्क़ रह जाएगा एक मुकाम के बगैर…
— Ink&Emotions ✍️
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