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तेरे कांधे का जो तिल है।

तेरे कांधे का जो तिल है।
जो तेरे कंधे पर छोटा सा तिल है ना जाना,
उससे मुझे बड़ी जलन होती है जाना।
सोचता हूँ मैं तुझसे इतना दूर क्यों
और वो तिल तेरे इतना पास क्यों।

कभी-कभी दिल करता है
मैं भी एक छोटी सी काली बिंदी बन जाऊँ
और चुपके से चिपक जाऊँ तेरे कंधे पर।
जब तू अपने बाल खोले,
मैं उन बालों के साये में खो जाऊँ,
उनकी खुशबू में घुलकर
तुझे एक हल्का सा गर्म एहसास दे जाऊँ।

और जब तू गीले बालों को झटके
और उनसे टपकता पानी तेरे बदन को छूकर गुज़रे,
तो उस हर बूंद के साथ
मैं भी तेरे साथ भीग जाऊँ।

जब तू साड़ी संभालते हुए
अपने कंधे पर उसे पिन से ठीक करे,
तो दिल घबरा जाता है कहीं
वो पिन तुझे चुभ न जाए…
तब मन करता है
मैं एक ढाल बन जाऊँ तेरे लिए,
और उस पिन का रुख अपनी तरफ मोड़ लूँ।

कुछ इस तरह तेरा ख्याल रखूँ
जैसे मखमली तेरे बदन पर
काला टीका बनकर मैं तेरी नज़र उतारता रहूँ…
तेरे लिए एक छोटा सा ताबीज़ बन जाऊँ,
जो हर पल तेरे साथ रहे,

और चुपके से बस इतना कहे—
तू महफूज़ है… क्योंकि मैं यहीं हूँ।

✍️ शिवन्या


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