तेरे नाम का
बहुत सोच-समझ कर आज ये फैसला किया है,
जब पूरी रात को तेरी याद में आँखें भिगोकर बिताया है।
दिल ने पूछा किस हक से तुझे इतना रोना आया है,
वो कौन है जिसने तुझे रात भर जगाया है।
क्या नाम इस रिश्ते का, मुझे समझ नहीं आया है,
मेरे दिल ने ढूँढ लिए तब खुद ही सारे जवाब,
फिर कहता है — मेरा हमसफ़र है वो जो यादों में आया है।
फिर मन में ख़याल आया,
मेरे जिस्म पर निशान कहीं भी क्यों ना आया है,
तब दिल ने ये फैसला सुनाया है —
कि
दिल ही नहीं, ये जिस्म भी तेरा,
इसके सारे हक भी तेरे,
और इस पर निशान भी तेरे नाम के चाहिए।
अब मुझे मेरे पति की निशानियाँ चाहिए,
मेरी माँग में सिंदूर तेरे नाम का चाहिए,
और माथे पर बिंदिया भी तेरे नाम की होनी चाहिए।
गले में काला धागा तेरे नाम का,
और हाथों में चूड़ियाँ भी तेरे नाम की होनी चाहिए।
जब साँस लूँ तो हर साँस में बस तेरा नाम हो,
और मेरे जिस्म पर लगे हर एक निशान
प्यार के तेरे दिए होने चाहिए।
समाज क्या कहता है, मुझे परवाह नहीं,
मेरे दिल को बस तेरा नाम अपने नाम के साथ चाहिए।
जब तू घर आएगा मुझसे मिलने,
तो ये निशानियाँ अपने साथ लेकर आना,
क्योंकि अब हमें हर करवाचौथ तेरे नाम का चाहिए।
लगा देना सारे निशान अपने हाथों से,
और पहना देना चूड़ियाँ मेरे हाथ में।
साथ भले ही ना रह सकूँ तेरे,
तेरे निशान रहेंगे जान साथ में -बस यही चाहिए।
मुझे बस अब तेरे लिए दुआएँ करनी हैं तेरी बीवी के नाम से,
अब मुझे जीना है तो तेरे नाम से,
और मरना भी मुझे तेरे नाम से ही चाहिए।
अब बस प्यार भी तेरे नाम का,
हम भी तेरे नाम के,
और अब इंतज़ार भी तेरे नाम का ही चाहिए।
-शिवन्या
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