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तेरे राज-ए-शगुफ़्ता की अदा जानता हूँ

तेरे राज-ए-शगुफ़्ता की अदा जानता हूँ

कहाँ से आयी है वो हवा जानता हूँ

तुझे रास नहीं आती मेरी परछाई वो बेवफा

मैं तो फ़क़त करना जुर्म-ए-वफ़ा जानता हूँ

तूने बुझा डालें हैं चिराग मेरे जीवन के फिर भी

तेरी नहीं कोई इसमें ख़ता जानता हूँ

कल तक थे साथ आज राहें जुदा हो गई

अपनी तकदीर में लिखी हर जफा जानता हूँ

गुस्ताखी क्या थी जो तुने निकाल बाहर कर दिया

मैं अब भी तेरे दिल को इस दिल का मकां जानता हूँ!©anuragrahi