तेरी आवाज़, मेरा मोहन
तेरी आवाज़ में वो जादू है,
जो मेरे कान्हा की बांसुरी में है।
तेरी एक पुकार पर खिंचा चला जाता है मेरा मन,
जैसे मुझे मेरे माधव ने ही पुकारा हो।
जब तू छोड़ जाता है मुझे,
और मैं तेरी याद में आँखें भिगोती हूँ,
दिल भारी-भारी सा, आँखें नम,
और मस्तक में बस तेरी ही यादें…
तब तेरी आवाज़ मेरे कानों में गूंजती है,
मेरे कन्हैया के माखन की तरह—
एकदम पाक, मोहक, मधुर
बिलकुल मखमली।
जब सो नहीं पाती हूँ मैं सारी-सारी रात,
तेरी आवाज़ माधव की पायल की झंकार सी लगती है,
जैसे धीरे-धीरे आकर
मेरे कृष्ण ने रख दिए हों अपने हाथ मेरे माथे पर।
कौन कहता है इश्क़ इंसान से होता है,
और एक ही बार होता है…
मुझे तो दो बार हुआ है—
एक मोहन से,
और दूसरा तेरी आवाज़ से।
और यही आवाज़ है,
जो मेरी रूह में गूँजती रहती है—
मेरे मोहन की, मेरे कृष्ण की,
मेरी हर धड़कन की।
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