V

तेरी जय हो

कभी बुद्धिमत्ता से अपनी
जीते थे शत देश महान
विजित बहादुर उन देशों के
करते थे तेरा जय-गान
कभी धीरता गरिमा और
शौर्य भी धर्म निज खो बैठी हो
फिर भी धर्म अटल जननी
जय हो, तेरी सदैव जय हो ॥
रचना हुई कोटि ग्रंथों की,
शत देशों के प्रतिनिधि पंडित
आए विषय-ज्ञान पाने को
अतिशय मन:कामना मंडित
कभी ज्ञान का स्तर गिरने पर
परम अधोगति भी पाई हो,
फिर भी शाश्वत सत्य पर अटल--
माँ तेरी जय हो, जय हो ॥
कुंठित हुई शक्ति जब वीरों
के असि की क्षमता अतुलित
घटी, ज्ञानप्रद सद्ग्रंथों की
रचना-शक्ति हुई शिथिलित
ऐसे विषम समय में भी
तुम नहीं प्रकंपित होती हो
उपयोगी सद्ग्रंथों की--
रक्षक, माता तेरी जय हो ॥
देवगगणों के लिए स्वादमय,
मधुरिम अमृत कुंभ समान
माँ, तेरा ऐश्वर्य रहे
पूरा सागर की भाँति
पापी हृदय शक्ति तेरी
हरने का सदा यत्न करता हो
फिर भी अक्षुण्ण निधिधारी
माता मेरी, तेरी जय हो ॥
इस भू को उत्कृष्ट किया
कर, सुखप्रद उद्योगों-धंधों को
तुमने जन्म दिया आनंद-
प्रदायक कितने ही धर्मों को--
सत्य खोजने जो आए हैं
उनको सत्य दान में दी हो
हमको भी स्वतंत्रता के प्रति
आकांक्षा दी, तेरी जय हो ॥
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©vikasgarg