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तेरी तलाश ...

हर वक्त निगाहों को किसी की तलाश रहती है....
एक हल्की सी परछाई मेरे आसपास रहती है...
कितना समझाया उसको कि खुश रहा करे
जाने क्या बात है वो उदास-उदास रहती है।
उम्र का ये कौन सा दौर है हयात..
जो समझ ना आया कभी मन में वही प्यास रहती है...
ख्वाहिशें, हसरतें दम तोड़ती रही हैं
फिर भी दिल है कि इक आस रहती है।
प्यास बुझती नहीं मय के प्यालों से अब
पाक़-ए-रूह को मगर जाने कैसी प्यास रहती है ।
तू कहीं भी रहे, दुनिया में ऐ 'अमर'
हर जगह हर पहर वो तेरे पास रहती है।
तुम्हारे मेरे मिलाकर कितने मिसरे हो ही गई।
देखते देखते एक पूरी ग़ज़ल हो ही गई।