तेरी ये अहद-ए-खता अब नामवर हो गई
शहर में तेरे अब हमें जिना दुश्वार हो गई।
हमने जो ठिकाना बनाना चाहा था तेरे दिल को
कमबख्त वो कोशिश बेसमर हो गई।
पाठ पढ़ाए उल्फत के गिता कुरान की तरह
मगर हर प्रयास मेरे तुझ पे बेअसर हो गई।
जो तिश्नगी थी दौड़ कर मंजिल को छूने की
रफ्ता रफ्ता वो भी अब मुख्तसर हो गई।
खवातीनो के ही कारण छोड़ा था राह-ए-वफा
देखिए आरजू फिर कैसे दर-बदर हो गई।
शायद अनुराग' तेरा लहज़ा ही बहुत कमजोर था
जो हर बात तेरी गर्द-ए-सफर हो गई।
©anuragrahi
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