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थोड़ी सी अलग

रहता तू ऑनलाइन करता मुझको justify
दे दे मुझको अब रिहाई छोड़ मेरी कलाई
मिट चुकी जो अच्छाई कर मन की सफाई
रहने दे साथ तन्हाई कर ऐसी खुदाई
पड़े ना कोई परछाईं अाई अब ऐसी मंहगाई
बज रही शहनाई हो रही उस घड़ी की विदाई
अाई कैसी ये जुदाई खाओ शौक से ये मिठाई
शुरू करो सिलाई करो चार पैसे की कमाई
नहीं रहीं अब कोई भलाई हो जाए जिसकी पिटाई
वो छड़ी जिस पर पड़ी छिड़ गई लड़ाई
कैसे दे अब दुहाई जिसने की ऐसी रुसवाई।
©anusingh