आज मैं फिर तुम पे एक सितम कर रहा हूं
तुम्हें तन्हा छोड़ रहा हूँ मैं तुमसे दूर हो रहा हूँ।
अब दिल से निकालो मुझे तेरा शहर छोड़ रहा हूँ,
जहर पि गया हूं तेरे लिए जहर छोड़ रहा हूँ।
जब सहर ही नहीं कोई मेरे इस राह में,
रफ्ता-रफ्ता ही सही रास्ता-ए-इश्क छोड़ रहा हूँ।
प्यास क्या अब लगे समन्दर जो हुं मै,
प्यास-ए-गम में गम-ए-दुनिया पी रहा हूँ।
तेरे ही लिए आज मैं शायर जो बना था,
तेरे ही लिए अब शायरी छोड़ रहा हूँ।
रहा नहीं जां पहले सी अब कलम में मेरे,
मैं वो रुठा बेजां अपना कलम छोड़ रहा हूँ।
©anuragrahi
S