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तलाशते हैं

झूठ के आस्माँ में सच की सरज़मीं तलाशते हैं
पथराई आन्खो मे आओ थोड़ी नमी तलाशते हैं..!
जिन्दगी की उलझन में अकसर ही जो खो जाता है
खोकर हसीं वादियों में वो हमनशी तलाशते हैं..!
क्यूँ उधेड़े बीता हुआ कल, क्यूँ बुनें आने वाला पल
रखकर भूल बैठे हैं जिसे उस आज में ही हंसी तलाशाते हैं..!
हर अच्छाई से बुराई क्यूँ ढूंढ़-ढूंढ़ कर निकाली है
देखकर आइने में आज वो एक कमी तलाशते हैं..!
हंसने मुस्कुराने के सबब सबने ढूंढ़े इधर उधर
बसी है जो हमारे भीतर आज वो खुशी तलाशते हैं!
तरसाना दीदार को उन्हे, छिप जाना तुम कहीं
देखें कैसे मेहबूब यहांं चाँद हसीं तलाशते हैं..!
-riyajangra
©riyajangra