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तनहाई

जाने क्या ढूंढती हूं
मैं खुद से ही खुद का पता पूछती हूं
अपनी तनहाई को अपनी खुशी का हवाला देकर
मैं रात की तनहाई से डरती हूं
मतकर इतने सितम ए खामोशी
अपनी उलझनों से मैं पहले ही मौन हूं
अपनी परछाई के तलक
अपने आप को ढूंढती हूं।।
©anvisha