तरक्की में वक्त रोड़ा क्यूँ अटकाती है
मुश्किलें गरिबों को ही क्यूँ आती है।
क्या उन्हें कुछ पाने का अधिकार नहीं
गर नहीं तो ख्वाब ऐसे क्यूँ दिखाती है।
कुछ करे तो नाकामयाब न करें तो मोहताज
मुफ़लिसी में ही सारे सितम क्यूँ आती है।
लोग कहते हैं सलामत गर हाथ-पैर है वो गरीब नहीं
फिर गरीबी मेरे दरवाजे क्यूँ खटखटाती है।
मैने कभी अपनी जिम्मेदारियों से मुंह नहीं फेरा
जीम्मेदारियाँ मेरे साथ बेवफाई क्यूँ निभाती है।
क्या बर्बादी का ही मैं चलाउ आतिशबाज़ी
फल नेकी का मिलते नज़र क्यूँ नहीं आती है।
मेरे खुसासारी का अंत शायद मेरी रूखसती है
हम जैसों को बुलाने में मौत इतना वक्त क्यूँ लगाती है।
मैं नसीब का मारा एक जिता जागता उदाहरण हूं
सही करने पर भी सही होते नज़र नहीं आती है।
©anuragrahi
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