सांझ कहूं या सुबह कहूं
पक्षी घर से आते है घर को जाते हैं
ये बिखरी छटा ही कुछ ऐसी है
लालिमा इसकी बिखरी सी है
तेज चमक से भरी सी है
नवयुग का प्रभात है जगा रहा
ऐ मुसाफ़िर! तू उठ देख रंगीन
सा है ये संसार तुझे बुला रहा
उगते सूरज की चमक देख
कर रहा जो इशारा तेरी ओर
है ये रोशनी जो चारों ओर
करता हूं प्रकाशित ब्रह्मांड को
गर तपना पड़े तुझे जीवन में
भयभीत मत होना ए इंसान
जो तपता है वहीं चमकता है
बस इतना सा रखना ध्यान।
©anusingh
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